Raag

राग भूपाली का परिचय

विशेषताएं यह पूर्वांग प्रधान राग है। इसका चलन मुख्यत: मन्द्र और मध्य सप्तक के प्रथम हिस्से में होता है। उत्तरांग प्रधान होने...

Written by Riyaz Room · 7 sec read >
वर्जित स्वरमध्यम (म), निषाद (नि)
वादी स्वरगंधार (ग)
सम्वादी स्वरधैवत (ध)
न्यास के स्वरसा, ग और प
मिलता-जुलता रागदेशकार
थाटकल्याण
जातिऔडव-औडव
गायन समयरात्रि का प्रथम प्रहर (6:00-9:00 PM)

विशेषताएं

  • यह पूर्वांग प्रधान राग है।
  • इसका चलन मुख्यत: मन्द्र और मध्य सप्तक के प्रथम हिस्से में होता है। उत्तरांग प्रधान होने से राग देशकार हो जाएगा।
  • इस राग में बड़ा ख़्याल, छोटा ख़्याल, तराना गाया जाता है। इसमें ठुमरी नहीं गायी जाती।
  • कुछ पुराने संगीतज्ञ इसमें प-रे की संगति करते है, किन्तु अधिकांश संगीतज्ञ ऐसा नहीं करते।
  • इसे राग भूप के नाम से भी जाना जाता है।
  • दक्षिण भारतीय संगीत में इसे मोहन राग कहते हैं।

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