History

The Origin and Development of Tanpura

तानपुरा लगभग 400 वर्षों से भारतीय शास्त्रीय संगीत में उपयोग होता आ रहा है। किन्तु तानपुरा नाम नवीन है। इससे पूर्व राजसी...

Written by Anshul Aggarwal · 14 sec read >

तानपुरा लगभग 400 वर्षों से भारतीय शास्त्रीय संगीत में उपयोग होता आ रहा है। किन्तु तानपुरा नाम नवीन है। इससे पूर्व राजसी ज़माने के संगीत कलाकार इस वाद्य को ‘तमूरा’ या ‘तम्बूरा’ कहते थे।

आधुनिक काल में उत्तर भारत और दक्षिण भारत दोनों को ही संगीत पद्दतियों में ‘तानपुरे’ का समान रूप से महत्वपूर्ण स्थान है। कोई भी गायक तानपुरे की अनुपस्थिति में अपना गायन (या कार्यक्रम) प्रस्तुत करना पसंद नहीं करता। उत्तर भारत में तो कुछ गायक अपने कार्यक्रम में दो-दो तानपुरे प्रयोग करते है। इसी प्रकार कुछ तंत्री वादक अपने साथ छोटे आकार के तानपुरे साथ लेकर चलते है जिन्हे वे ‘तम्बूरी’ कहते हैं।

नीचे प्राचीन, मध्य एवं नवीन कालीन संगीत ग्रंथों से अध्ययन करके कुछ बिंदुओं पर प्रकाश डाला गया है जिससे आप तानपुरा के उद्गम एवं विकास के बारे में जान सकें।

  • अनुश्रुति है, कि तम्बूरा (या तोम्बूरु वीणा) का अविष्कार ‘तुम्बुरु’ नामक गन्धर्व ने किया था जो कि एक प्राचीन संगीताचार्य थे। इस वाद्य को प्राचीन ग्रंथकारों ने ‘ तम्बूर, तम्बूरा, तम्बूरी, तुम्बरु, तुम्बुर, तम्बरी, तोम्बुर, तोम्बुरु एवं तुम्बरी इत्यादि नामों से सम्बोधित किया है। इसे तुम्बुरी वीण भी कहा जाता रहा है। ऐतिहासिक दृष्टि से देखा जाये तो तुम्बरु नाम के कई व्यक्ति हुए है। तुंबरू एक गन्धर्व का नाम है जो कश्यप और प्राचा के पुत्र थे। तुंबरू एक प्राचीन ऋषि का नाम था। गन्धर्व का एक नाम तुम्बूर भी है। तुम्बरु एक नाटक व गीतों के लक्षणकर्ता भी रहे हैं। ये नारद के समकालीन थे। इन तुंबरू नामक व्यक्तियों द्वारा वीणा बजायी जाती रही होगी और यहाँ संभव है, कि तत्कालीन समय में उस वीणा-विशेष का नाम तुम्बुरु (तुंबरू) रहा होगा, किन्तु नाट्यशास्त्र, अभिनव भारती एवं संगीत रत्नाकर ग्रंथों में इस नाम के वाद्य का उल्लेख नहीं मिलता। महाराणा कुंभ के ‘संगीतराज’ में इसका तम्बरी वीणा के नाम से वर्णन मिलता है। सुधा कलश एवं पंडित विद्याविलासी ने तुंबरू की वीणा का नाम कलावती बताया है।

अतः स्पष्ट प्रमाण के अभाव में यह कहना कठिन है, की तुंबरू की वीणा ही ‘तुंबरू वीणा’ रही होगी।

  • अलाबु और ‘तुम्बनी’ संस्कृत भाषा के समानार्थी शब्द है जो ‘जो एक फल विशेष-तुमरिया’ (Gourd) के अर्थ में प्रयुक्त होते है। अतः यह भी संभव है, की तुम्बे से बनी अलाबु वीणा तथा वर्तमान तम्बूरा एक ही तंत्र वाद्य के दो पृथक-पृथक नाम हों। प्राचीन ग्रंथों में अलाबु वीणा का स्पष्टः वर्णन नहीं दिया गया है किन्तु महाकवि बाणभट्ट के हर्षचरितम (भारतीय सम्राट हर्षवर्धन का जीवनचरित्र ग्रन्थ) नामक गद्य काव्य से स्पष्ट हो जाता है, कि ‘ अलाबु वीणा’ न केवल सम्राट हर्ष के समय (606-647  ई.) में प्रचलित थी, बल्कि वह आकार में भी इतनी बड़ी होती थी कि उसके दंड के खोखले भाग में किसी तलवार को भी छुपाया जा सकता था। साथ ही उस वीणा में नीचे की और एक बड़ी तुम्बी भी लगी रहती थी।

    उक्त वर्णन से स्पष्ट होता है, कि ‘अलाबु वीणा’ वर्तमान तानपुरे (या तम्बूरे) जैसी बड़े तथा लम्बे दंड वाली तथा निचले सिरे की और तुम्बा लगी होती थी और उसे धीरे-धीरे (तानपुरे की तरह) बजाया जाता था। ये समस्त लक्षण वर्तमान तम्बूरे जैसे हैं। अतः विद्वानों का यह कथन, कि प्राचीन काल में तानपुरे जैसे किसी तंत्री का अस्तित्व नहीं था, सर्वथा निर्मूल साबित होता है। तथापि यह फिर भी नहीं कहा जा सकता है कि तानपुरा ही अलाबु वीणा नाम से प्रचलित रहा होगा। क्योंकि डॉ. लालमणि मिश्र का स्पष्ट कथन है ‘प्राचीन काल से लेकर बारहवीं शताब्दी तक गुफाओं, स्तूपों मंदिरों आदि में बनायीं गयी मूर्तियों में यद्यपि भिन्न-भिन्न प्रकार की वीणाओं का चित्रण किया है, किन्तु तम्बूरे का चित्रण कहीं प्राप्त नहीं होता। जिन वीणाओं का वर्णन भरत के नाट्यशास्त्र से संगीत रत्नाकर तक के ग्रंथों में प्राप्त होता है, उनमे से किसी का वर्णन ‘तम्बूरा’ जैसा नहीं है। वास्तव में हमारी प्राचीन गान पद्दति ऐसी थी जिसमे तम्बूरा जैसे वाद्य की आवश्यकता नहीं थी।
  • ‘तम्बूरा’ नामक तंत्री वाद्य का सर्वप्रथम उल्लेख ग्वालियर के राजा मानसिंह तोमर द्वारा (अथवा उनके नाम से किसी तत्कालीन विद्वान द्वारा) लिखित संगीत ग्रन्थ ‘मानकुतूहल’ में प्राप्त होता है। इस ग्रन्थ के अनुवादक फ़कीरुल्ला ने पांचवें सर्ग (chapter) में वाद्यों का वर्णन करते हुए उल्लेख किया है, कि-एक बाजा ओर होता है जिसे ‘तम्बूरा’ कहते है, इसमें एक तुम्बा होता है और वीणा कि तरह दो(2) तार धातु के तथा दो(2) तांत के होते है। कुछ लोग उसमे पांच (5) तार लोहे के तथा तंबि (ताम्बा) के लगाते हैं।
  • आचार्य कैलाश चंद्र देव बृहस्पति एवं श्रीमती सुलोचना यजुर्वेदी ‘तम्बूरे’ का प्रचलन इससे और भी पूर्व के काल (सन 1286 -1290 ई.) में स्वीकारते है इनका कथन है, कि कैकुवाद (ई.1286 -1290) के काल में यात्रा के प्रत्येक पड़ाव में संगीत गोष्ठियां होती थी तथा घँग, रबाब, कमाच, मिस्कल, बांसुरी, और तम्बूरे कि आवाज़ों से शिशिर गूंजता रहता था।

मुहम्मद-बिन-तुग़लक के समय (सन 1325-50) में जब सुल्तान महल में या यात्रा में होता था तब दो सौ नक्क्कारे, चालीस बड़े तम्बूरे, बीस बड़ी दुदुम्भी और 10 बड़े झांझ बजते थे। सिकंदर लोदी के राज्य (1488-1577) में एक तम्बूरा वादक भी था।

मुग़ल बादशाह अकबर के दरबारी कलाकारों की सूची में चार तम्बूरा वादकों का उल्लेख है। फ़कीरुल्लाह ने लिखा है, कि शौकी नामक कलाकार तम्बूरा बजाने में अद्वितीय था। अबुलवर्फा तम्बूरा खूब बजाता था।

  • डॉ प्रकाश महाडिक का कथन है, कि कैकुवाद से लेकर मुहम्मद शाह रंगीले के राज्यकाल तक तम्बूरा वादकों का महत्वपूर्ण स्थान था। किन्तु यदि वह तम्बूरा आधुनिक तानपुरे के सामान होता तो उन वादकों को कोई विशेष स्थान मिलना असंभव था। इसलिए इस वाद्य पर एकल वादन या संगति की जाती रही होगी, ऐसा अनुमान किया जा सकता है। आइन-ए-अकबरी (अकबर के संस्थान) में तम्बूरा वादकों कि चर्चा तो है, किन्तु तम्बूरा वाद्य का अन्य वाद्यों के साथ वर्णन नहीं मिलता है और फ़कीरुल्ला ने जो वर्णन तम्बूरे का किया है, वह तुम्बे और तार तक ही सीमित है । इसलिए इस वाद्य कि रचना के सम्बन्ध में स्थिति स्पष्ट नहीं होती।
  • पं. अहोबल ने ‘संगीत पारिजात’ (ई. सन 1560) में ‘तौंबूर’ के दो प्रकार (1) निबध्द और (2) अनिबद्ध बताये हैं। निबध्द वह है जिसके दंड पर तांत से परदे बंधे रहते हैं । अनिबद्ध में इस प्रकार कि व्यवस्था नहीं रहती है। पं. अहोबल ने निबद्ध में चार तंत्रियों के दो अँगुलियों से वादन करने का विधान बताया है। उनके अनुसार इसे दारुज कहते हैं। इसकी लम्बाई रुद्रवीणा कि भांति बतायी है। इसमें लकड़ी के दंड का प्रयोग किया जाता था।
  • महाराज सवाई प्रताप सिंह देव ने भी तम्बूरा के दो प्रकारों का वर्णन किया है जो निबद्ध और अनिबद्ध है।

सवाई प्रताप सिंह देव के समय (1779-1804 ई.) में तम्बूरा के दो प्रकार प्रचलित थे। एक निबद्ध और दूसरा अनिबद्ध। दोनों को तुम्बुरु गन्धर्व की वीणा कहा जाता था। (2) निबद्ध तम्बूरा लौकिक (लोक) में ‘सितार’ नाम से जाना जाता था। इसके दंड पर तांतों से पर्दे बंधे होते थे । जिन्हे सितार की तरह बजाकर स्वर निकालते थे। अनिबद्ध तम्बूरा के तारों को छोड़कर उसके स्वर के आधार पर गाया जाता था।

तात्पर्य यह है की, अठारहवीं सदी में प्रचलित ‘तौंबूर वीणा’ तम्बूरा नाम से जानी जाती थी। इसके दो प्रकार थे। इनमे से एक प्रकार जो की निबद्ध तम्बूरा था, सितार नाम से प्रचलित हुआ और दूसरा प्रकार जो की ‘अनिबद्ध’ था आगे चलकर ‘तानपुरा’ नाम ग्रहण करके कंठ संगीत की सहायतार्थ प्रयुक्त होने लगा और जिसे हम आज ‘तानपुरा’ के नाम से जानते हैं।

स्रोत (Source):-
भारतीय तंत्री वाद्यों का ऐतिहासिक विवेचन

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